सुन

सुन,

तुझे जानता हूँ,
इसलिए रोका करता हूँ ।

तू शायद नज़दीकियाँ नहीं चाहती
लेकिन मैं चाहता हूँ 


सुन,
तेरी आदत हो गई है,
इसलिए रोका करता हूँ ।

तुझ से शायद अलग हूँ मैं
कि हमारी रोज़ाना मुलाकातों को
कुछ और ही समझ बैठा ।

सुन,
मैं शायद गलत हूँ ,
इसलिए रोका करता हूँ ।

जिस पेन से तूने मेरे हाथ पर
मेरे नाम का फूल बनाया था
उसका निशां मैंने आज भी संभाला है

जिस पन्ने पर तूने अपने हाथों से
मेरा चहरे का कार्टून बनाया था
उस पन्ने को मैंने आज भी संभाला है

सुन,
तुझे खोने का डर है मुझे,
इसलिए रोका करता हूँ ।

तुझे शायद ये सब बचपना लगे
क्योंकि शायद मैं उस दिन के बाद
कभी बड़ा हो ही नहीं पाया

सुन,
तूने मुझे बच्चा बनना सिखाया है,
इसलिए रोका करता हूँ ।

पसंद है मुझे जब हम बेपरवाह बैठते हैं
और वक्त को गुज़रते हुए देखते हैं
ये जानते हुए भी कि वो लम्हे फिर नहीं लौटेंगे ।

सुन,
कभी तो तुझे अलविदा कहना पड़ेगा,
इसलिए रोका करता हूँ ।

मैं जानता हूँ
कि रास्ते कभी-न-कभी तो अलग होंगे ,
उस मोड़ पर पहुँचने के पहले
तुझे देखना चाहता हूँ ।

सुन,
तुझे चाहता हूँ ,
इसलिए रोका करता हूँ ।

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