शुक्रिया

(यह कविता काॅलेज के प्रथम वर्ष की समाप्ति के अवसर पर लिखी गई है।)


कुछ मीठी सी नज़मे 

कुछ नमकीन सी यादें

कुछ नए यारों के साथ

कुछ नए से अफ़साने...


ज़िन्दगी की बेरोक कशमकश में 

न जाने एक और साल कैसे बीत गया ।।


इस छोटे से दिल में इन यादों को बटोर कर

आज मैं सुकून से अपनी आँखें बंद करूँगा ।।


गुज़रे पलों को वापस लाना कौन नहीं चाहता, 

बीते लम्हों को फिर से निहारना कौन नहीं चाहता ।


कौन नहीं चाहता कि वो दिन वापस आए

जब हमने उस रंगमंच को कुछ घंटों के लिए अपना साम्राज्य बनाया था ।

कौन नहीं चाहता कि वो दिन वापस आए 

जब हमने अपनी ही बेफिक्र धुन में नाच कर

सभी को नचाया था ।


कौन नहीं चाहता कि वो गपशप वाली शाम,

वो पार्टी वाली रात, कभी सुबह में ना बदले ।

कौन नहीं चाहता कि वो कभी खत्म ना होने वाली बात 

कभी खत्म ना हो ।


कहते हैं दीवानगी "खोजी" नहीं जाती,

पागलपन को दिल में "टटोला" नहीं जाता ।

रसिक तो सभी होते हैं अपनी पहली साँस से,

इस रसिक को मस्ताने में बदलने के लिए 

कोई "रास्ता" चला नहीं जाता ।।


आती रहेगी बहारें मस्ती की,

जोश की नदियों में गोता लगाने के लिए 

कोई "मौका" ढूंढा नहीं जाता ।।





दोस्ती की नज़ाकत को तो सारी कायनात समझ नहीं पाई

ऐसी रूहानियत को समझा नहीं, आज़माया जाता है ।

पाँच साल के इस लम्बे दौर के पहले मुकाम पर 

मेरा दोस्त बनने के लिए 

शुक्रिया ।।


सफ़र तो महज़ इल्म पाने की एक जुस्तजू है,

जितना चलोगे, रास्ता उतना बढ़ता जाएगा ।

मेरे इस सफ़र में 

मेरा हमराही बनने के लिए 

शुक्रिया ।।


ज़िन्दगी तो एक खुली किताब सी है,

ढूंढोगे तो सराहने भी मिलेंगी और शिकवे भी ।

मेरी इस किताब के पन्नों पर 

अपने अल्फ़ाज़ छोड़ जाने के लिए 

शुक्रिया ।।


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