मिलना था तुमसे रुबरु

मिलना था तुमसे रुबरु 

इसके पहले कि ये दिन ढल जाए ।

देखना था तुम्हे फिर एक बार 

इसके पहले कि ये साँसे थम जाए ।।


अस्पताल की बिस्तर पे लेटे हुए,

अपने जीवन-गीत का आखिरी छंद गाते हुए,

मैंने सोचा कि एक बार फिर 

इस गीत को दोहराया जाए ।


क्योंकि 

मिलना था उससे रुबरु 

जो इस गीत में अपनी आवाज़ छोड़ गया था ।


मिलना था तुमसे रुबरु ।।


इतिहास के झरोखे से 

जब मैंने अपने अतीत में झाँका,

तो पाया कि मैं कल कितना अलग था,

और आज कितना अलग हूँ ।


मेरे वजूद की ये बदलती तस्वीर,

मेरे मिज़ाज के ये बदलते रंग,

मेरे चेहरे की ये बदलती नक्काशी 

को तराशा था जिस फ़नकार ने,

मिलना था उससे रुबरु ।


मिलना था तुमसे रुबरु ।।


देखना था उस घने बादल को,

जिसने इन बारिश की बूंदों को आकार दिया, 

इसके पहले कि ये कतरा समंदर में बह जाए।


निहारना था उस शबनम को,

जिसने इस सूखे पेड़ पर पलाश के गुल खिलाए,

इसके पहले कि ये ज़मीन बंजर हो जाए।



इनसान तो भावनाओं का खज़ाना है;

हँसना-रोना तो ज़िन्दगी का तराना है;

बदलती तस्वीरों का सिलसिला है ये,

झिलमिलाते रंगों का ये आशियाना है ।


मेरी हर मुस्कराहट, हर रंजिश का स्वाद 

चखा था मेरे साथ जिस हमराही ने,

मिलना था उससे रुबरु ।


मिलना था तुमसे रुबरु ।।


मैं जाने से पहले 

तुमसे एक बात कहना चाहता था;

अपना याराना कायम रखने के लिए 

तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूँ, ये बताना चाहता था ।


इसके पहले कि मेरी कटी पतंग 

ज़मीन से टकरा जाए,

इस पतंग को जिस झोंके ने आसमां में लहराया था,

मिलना था उससे रुबरु ।


मिलना था तुमसे रुबरु ।।


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