था लफ्ज़ों पर बोहोत कुछ कहने को
लेकिन हाथ से बटन दबाते-दबाते
आधी बातें न जाने कहाँ गुम हो गई
था रास्ता हमारी बातों का कुछ और
कि मेरी सोच को अल्फाज़ में बदलते-बदलते
मेरी बातें अपना राह भटक गई
रोका नहीं जाता मुझसे
मेरी आदतें पहचान लो
सोचा नहीं जाता मुझसे
जब मैं किसी से बात करता हूँ
दिल और दिमाग के इस जंग में
मेरा दिल हमेशा बाज़ी मारता है
कम शब्दों में निपटाने की इस भगदड़ में
बेचारा दिमाग अकसर हार मानता है
दोस्त हो, इसलिए कहता हूँ
मैं अपने अंदर किसी और दुनिया में रहता हूँ
थोड़ा मुँहफट हूँ, और बोहोत मनमौजी
खयालों के शिकारे में दिनभर बहता हूँ
इसलिए
मत सोचना कि मैंने तुम्हे ये क्या कह दिया
मैं वो नहीं हूँ, जो मैंने बिन सोचे लिख दिया
तुम जानते हो मुझे, तभी तुम पर भरोसा है
मैं ग़लत नहीं हूँ- बस, मैंने ग़लत लिख दिया
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